एससीओ शिखर सम्मेलन 2025: भारत, चीन और रूस का मिलन और दुनिया का नजरिया
चीन के तियानजिन में हाल ही में संपन्न हुए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात ने दुनिया का ध्यान खींचा है। यह सिर्फ एक नियमित बैठक नहीं थी, बल्कि एक ऐसा मंच था जहां तीन प्रमुख शक्तियां एक साथ आईं, और इसने वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी छाप छोड़ी।
यह लेख इस महत्वपूर्ण बैठक के परिणामों और उस पर दुनिया की, विशेष रूप से पश्चिमी देशों की, प्रतिक्रिया पर प्रकाश डालता है।
ऐतिहासिक संदर्भ: RIC से SCO तक
भारत, चीन और रूस के बीच सहयोग की जड़ें RIC (रूस-भारत-चीन) त्रिकोण में हैं, जिसकी शुरुआत 2002 में हुई थी। यह मंच पश्चिमी प्रभुत्व के खिलाफ एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था बनाने के उद्देश्य से शुरू हुआ था। हालांकि, समय के साथ इस त्रिकोण में कई उतार-चढ़ाव आए, खासकर भारत और चीन के बीच सीमा विवादों के कारण। SCO एक व्यापक मंच है, जिसमें कई अन्य सदस्य देश भी शामिल हैं, और यह इन तीनों देशों को साझा हितों पर काम करने का एक औपचारिक अवसर प्रदान करता है।
बैठक के प्रमुख एजेंडे और चर्चाएँ
तियानजिन शिखर सम्मेलन में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई, जो केवल कूटनीतिक औपचारिकताओं से परे थीं।
- आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख: भारत की पहल पर, एससीओ के सभी सदस्य देशों ने कश्मीर में हुए आतंकी हमले की कड़ी निंदा की। यह भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत थी, क्योंकि इससे सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता मिली और यह SCO के घोषणापत्र में भी शामिल किया गया।
- आर्थिक सहयोग और अमेरिकी टैरिफ का जवाब: अमेरिकी टैरिफ के बीच, इन तीनों देशों ने आपसी व्यापार को बढ़ावा देने और डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर जोर दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैठक अमेरिका के व्यापारिक दबाव का एक सामूहिक जवाब है।
- यूक्रेन संकट पर चर्चा: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन में समाधान खोजने में भारत और चीन की भूमिका की सराहना की। यह दर्शाता है कि रूस इस मुद्दे पर इन दोनों देशों के कूटनीतिक प्रभाव को महत्व देता है। भारत ने लगातार बातचीत और कूटनीति के माध्यम से संघर्ष को हल करने की वकालत की है।
- सीमा विवाद पर प्रगति: प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक में सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने पर सहमति बनी। इस सकारात्मक कदम से पिछले कुछ सालों से चले आ रहे तनाव को कम करने में मदद मिली है।
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में सहयोग: शिखर सम्मेलन में एआई और अन्य तकनीकी नवाचारों में सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। सदस्य देशों ने एआई के विकास और उपयोग में सहयोग करने की तत्परता व्यक्त की।
भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक लाभ
यह शिखर सम्मेलन भारत के लिए बहुआयामी महत्व रखता है।
- रणनीतिक स्वायत्तता: भारत ने पश्चिमी और पूर्वी गुटों के बीच एक संतुलित विदेश नीति का प्रदर्शन किया है। अमेरिका से संबंधों को मजबूत रखने के साथ-साथ चीन और रूस से संवाद जारी रखकर भारत ने अपनी "राष्ट्र प्रथम" (Nation First) की नीति को पुष्ट किया है।
- सुरक्षा सहयोग: आतंकवाद, उग्रवाद और ड्रग तस्करी जैसे मुद्दों पर SCO के माध्यम से सामूहिक रूप से कार्य करने से भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा मजबूत होती है। SCO का आतंकवाद-निरोधक ढांचा भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
- आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा: मध्य एशियाई देशों से प्राकृतिक संसाधनों तक पहुँच और व्यापारिक संबंध बढ़ाने का मौका मिलता है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पश्चिमी देशों और वैश्विक मीडिया का नजरिया
इस बैठक को वैश्विक स्तर पर कई तरह से देखा गया। पश्चिमी देश, विशेष रूप से अमेरिका, इस त्रिकोणीय मिलन को काफी बारीकी से देख रहे हैं।
- "एंटी-वेस्टर्न" गुट की चिंता: अमेरिका और यूरोपीय देशों में इस बात की चिंता है कि यह बैठक एक "एंटी-वेस्टर्न" गुट के उद्भव का संकेत हो सकती है। रूस-यूक्रेन संघर्ष और अमेरिका के साथ व्यापारिक तनावों के बीच, इन तीन देशों का एक साथ आना एक बहुध्रुवीय (multipole) विश्व व्यवस्था की ओर एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती दे सकता है।
- बदलते वैश्विक समीकरण: कई विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठक प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण थी। यह फोटो-ऑप्स से परे थी, क्योंकि इसने दिखाया कि भारत, चीन और रूस जैसी शक्तियां साझा चिंताओं पर एक साथ आ सकती हैं। यह वैश्विक राजनीति में एक नए समीकरण का संकेत है।
- चीन के वर्चस्व पर सतर्कता: कुछ पश्चिमी विश्लेषकों का मानना है कि चीन इस मंच का उपयोग अपने आर्थिक और भू-राजनीतिक दबदबे को बढ़ाने के लिए कर सकता है। भारत और अन्य सदस्य देशों के लिए चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी।
निष्कर्ष
एससीओ शिखर सम्मेलन में भारत, चीन और रूस की मुलाकात सिर्फ एक औपचारिक घटना नहीं थी, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में आ रहे बड़े बदलावों का एक प्रतिबिंब थी। यह बैठक दर्शाती है कि एशिया की उभरती शक्तियां अब वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को और अधिक मजबूती से स्थापित कर रही हैं। यह दुनिया को एक ऐसा संकेत देता है, जहां देश अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए गुटबाजी से ऊपर उठकर काम कर रहे हैं, जो एक अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर एक कदम है।
